Raja Dahir Sen : King who fought with valour and trampled the Islamic Invaders. इस्लामी आक्रांताओं के सीने के दाह : राजा दाहिर सेन

आठवीं सदी के इस्लामी आक्रांताओं के सीने के दाह : राजा दाहिर सेन

भारतवर्ष की आठवीं सदी शूरवीर नायक के तौर पर जाना जाता था - राजा दाहिर सेन । राजा दाहिर सेन के शासन के ७४ वर्षों के दौरान नौ इस्लामी आक्रांताओं ने कम से कम १५ बार सिंध पर आक्रमण किया, लेकिन सिंध के इस शूरवीर ने १४ बार इन इस्लामी आक्रमणकारियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया । बहुत कम लोग जानते हैं कि जब इस्लामी आक्रांताओं ने ६३४ में फारस पर आक्रमण किया था, तो उन्होंने ६३८ में एक बदमाश मुस्लिम खलीफा उमर के आदेश पर, सिंध में भारत पर आक्रमण किया, जो केवल चार वर्षों के अंतराल में हुआ था। लेकिन जब फारस ने सत्रह वर्षों में, ६५१ तक आत्मसमर्पण कर लिया था, तो इस्लामी आक्रांताओं को भारत में सात सौ साल लग गए और उसके बाद भी वे शांति से भारत पर शासन नहीं कर सके।




सिंध के प्रतापी राजा थे दाहिर सेन

आज सिंध मुस्लिम देश का एक हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान कहा जाता है और जो १९४७ तक हिंदू भारत का हिस्सा था । सिंधु नदी के पूर्व में बसा सिंध। आज बेशक पाकिस्तान के हिस्से में है. लेकिन वैदिक काल में ये जगह हमारे भारत के ऋषि-मुनियों की तपोभूमि हुआ करती थी. मान्यता है कि वेदों की अलौकिक और कालातीत ऋचाओं की रचना सिंधु नदी के तट पर बसे सिंध के सुरम्य, मनोरम और पतितपावन वातावरण में हुई है. इसी सिंध क्षेत्र पर सातवीं शताब्दी के आखिरी दो दशक और आठवीं शताब्दी के शुरू के कुछ वर्षों तक एक परम प्रतापी, प्रजापालक और नीतिज्ञ राजा का शासन था - नाम था दाहिर सेन.


सिंध के तानेबाने में लगे दो तीर

दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है ये कि इतिहास के पन्नों में राजा दाहिर सेन को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे. भारतवर्ष की सातवीं और आठवीं सदी साक्षी रही इस परम प्रतापी राजा की जिन्होंने ६७९ ईस्वी में जब सिंध की राजसत्ता संभाली तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार था. अपनी मातृभूमि की आन बान और शान की खातिर उन्होंने इस्लामी आक्रांताओं से दुश्मनी मोल ली और युद्धभूमि में उनको घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. ६३२ ईस्वी में साहसी राय की मृत्यु के बाद चच न सिर्फ राजा बना बल्कि उसकी विधवा सोहन्दी पर उसका दिल भी आ गया. दरबारियों से सलाह-मशविरे के बाद चच ने सोहन्दी से शादी कर ली.

राजा चच तंगदिल और अदूरदर्शी इंसान था. राजा बनते ही उसने सिंध के प्रमुख समुदायों लोहाणों, गुर्जरों और जाटों को अपमानित कर उन्हें उच्च पदों से हटा दिया. राजा चच के इस कदम से लोहाण, गुर्जर और जाट नाराज हो गए. सिंध के सामाजिक ताने-बाने के सीने में ये पहला तीर साबित हुआ. इन सब के बावजूद राजा चच ने सिंध पर तकरीबन ४० वर्षों तक शासन किया. इस दौरान मजबूत सैन्य शक्ति और युद्ध कौशल की वजह से उसने राज्य का विस्तार ही किया. ६७१ ईस्वी में चच की मृत्यु के बाद उसका भाई चंदर उत्तराधिकारी बना.

राजा चंदर ने भी अपने भाई चच की तरह एक बड़ी गलती की. राजा बनते ही उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. इतना ही नहीं बौद्ध को अपना राज धर्म भी घोषित कर दिया. राजा चच ने लोहाणों, गुर्जरों और जाटों की नाराजगी मोल ली थी उसके भाई राजा चंदर ने बौद्ध को राजधर्म घोषित कर हिन्दुओं को कुपित कर दिया. सिंध के सामाजिक ताने-बाने के सीने में चंदर का ये कदम दूसरा तीर साबित हुआ.

राजा चंदर ज्यादा समय तक शासन नहीं कर सका. ६७९ ईस्वी में उसकी मृत्यु के बाद चच के पुत्र दाहिर सेन ने सिंध की गद्दी संभाली. अपने शासनकाल में दाहिर ने सिंध की गौरवमयी धरती को पुरानी गरिमा से जोड़ते हुए खुशियों से भर दिया. राजा बनते के बाद दाहिर सेन ने सिंध के सीने से उन तीरों को निकालने की कोशिश की. जो किसी और ने नहीं बल्कि उनके पिता और चाचा ने ही चलाए थे. लेकिन दाहिर सेन को तो असली चुनौती मिली अरब के इस्लामी आक्रमणकारियों से. क्योंकि सिंधु का वैभव और ऐश्वर्य उनसे देखा नहीं जा रहा था

हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना की राजा दाहिर ने -- भाग 2 - To be continued ....


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